कविता: पहाड़ की चुप्पी में
जब शहर की आवाज़ थक जाती है, तब पहाड़ की चुप्पी बोलती है.
उस चुप्पी में घर भी है, दूरी भी, और लौट आने की एक कोमल उम्मीद भी.
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जब शहर की आवाज़ थक जाती है, तब पहाड़ की चुप्पी बोलती है.
उस चुप्पी में घर भी है, दूरी भी, और लौट आने की एक कोमल उम्मीद भी.
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